Archive for the ‘Dhumil Sudama Pandey’ Category

कविता - कुछ टुकडे

Wednesday, February 3rd, 2010

एक सही कविता
पहले
एक सार्थक वक्तव्य होती है।

कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।

कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।

कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

आखिर मैं क्या करूँ
आप ही जवाब दो?
तितली के पंखों में
पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में
कौन सा गुल खिला दूँ
जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा
हाशिये पर चुटकुला बन रहा है
क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर
निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दँ?

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल

कुछ सूचनाएँ

Wednesday, February 3rd, 2010

सबसे अधिक हत्याएँ

समन्वयवादियों ने की।

दार्शनिकों ने

सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।

भीड़ ने कल बहुत पीटा

उस आदमी को

जिस का मुख ईसा से मिलता था।
वह कोई और महीना था।

जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,

किंतु इस बार तो

मौसम बिना बरसे ही चला गया

न कहीं घटा घिरी

न बूँद गिरी

फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु

कई प्रतिशत बढ़ गए
कई बौखलाए हुए मेंढक

कुएँ की काई लगी दीवाल पर

चढ़ गए,

और सूरज को धिक्कारने लगे

–व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है

सूरज कितना मजबूर है

कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।
हवा बुदबुदाती है

बात कई पर्तों से आती है—

एक बहुत बारीक पीला कीड़ा

आकाश छू रहा था,

और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर

शौचालयों के सामने

पँक्तिबद्ध खड़े हैं।
आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं

लोग खोई हुई आवाज़ों में

एक दूसरे की सेहत पूछते हैं

और बेहद डर गए हैं।
सब के सब

रोशनी की आँच से

कुछ ऐसे बचते हैं

कि सूरज को पानी से

रचते हैं।
बुद्ध की आँख से खून चू रहा था

नगर के मुख्य चौरस्ते पर

शोकप्रस्ताव पारित हुए,

हिजड़ो ने भाषण दिए

लिंग-बोध पर,

वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं

आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ

अध्यापिकाएँ बन गई हैं

और रिटायर्ड बूढ़े

सर्वोदयी-

आदमी की सबसे अच्छी नस्ल

युद्धों में नष्ट हो गई,

देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य

विद्यालयों में

संक्रामक रोगों से ग्रस्त है
(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को

सड़को पर

किश्तियों की खोज में

भटकते हुए देखा है)
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ

भीतर ही भीतर

एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है
पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ

प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं

सबसे अच्छे मस्तिष्क,

आरामकुर्सी पर

चित्त पड़े हैं।

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल

कविता

Wednesday, February 3rd, 2010

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे
कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं –
आदत बन चुकी है
वह किसी गँवार आदमी की ऊब से
पैदा हुई थी और
एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ
शहर में चली गयी

एक सम्पूर्ण स्त्री होने के पहले ही
गर्भाधान कि क्रिया से गुज़रते हुए
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादी वाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिश में भीगते हुए
उसने जाना कि हर लड़की
तीसरे गर्भपात के बाद
धर्मशाला हो जाती है और कविता
हर तीसरे पाठ के बाद

नहीं – अब वहाँ अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, अगर हो सके तो बगल के गुज़रते हुए आदमी से कहो –
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

इस वक़्त इतना ही काफ़ी है

वह बहुत पहले की बात है
जब कहीं किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीख़ती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब –
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है

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- सुदामा पाण्डेय धुमिल