Archive for the ‘Dinkar ji’ Category

पुरुरवा कि उक्ति

Saturday, July 11th, 2009

Some pieces from this poem
(1)

मृत्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ

पर , न जाने बात क्या है !
इन्द्र का आयुध , पुरुष जो झेल सकता है
सिहं से बांहे मिला कर खेल सकता है
फूल के आगे वाही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता

विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से

मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर सीस मरना चाहता हूँ
मैं तुम्हारे हाथ का लीला-कमल हूँ
प्रण के सर में उतरना चाहता हूँ

…………
(2)

मृत्य नर को देवता कहना मृषा है
देवता शीतल , मनुज अंगार है

देवताओं की नदी में ताप की लहरें न उठती
किन्तु नर के रक्त में ज्वालामुखी हुंकारता है
घुर्नियाँ चिंगारियों की नाचती हैं
नाचते उड़ कर दहन के खंड पत्तों-से हवा में
मानवों का मन गले-पिघले अनल की धार है

चाहिए देवत्व
पर , इस आग को धर दूं कहाँ पर ?
कामनाओं को विसर्जित व्योम में कर दूं कहाँ पर ?
वह्नी का बेचैन यह रस्कोश , बोलो , कौन लेगा ?
आग के बदले मुझे संतोष , बोलो , कौन देगा ?

-. रामधारी सिंह दिनकर

कविता और विज्ञान

Saturday, July 11th, 2009

हम रोमांटिक थे
हवा में महल बनाया करते थे
चाँद के पास हम ने एक नीड बसाया था
मन बहलाने को हम उस में आया जाया करते थे

लेकिन तुम हम से ज्यादा होशियार होना
कविता पढने में समय मत खोना
पढना ही हो , तो बजट के आंकड़े पढो
वे ज्यादा सच्चे और ठोस होते हैं

अगर तुम यह समझते हो
कि तुम केवल शरीर नहीं
आत्मा भी हो
तो यह अनुभूति तुम्हें
तकलीफ में डालेगी
जो सभ्यता अदृश्य को नहीं मानती
वह आत्मा को कैसे पालेगी ?

विज्ञान कि छड़ी जहां तक पहुंची है
बुद्धि सत्य को वहीँ तक मानती है
मशीन को लाख समझाओ
वे आत्मा को नहीं पहचानती हैं

सांख्यिकी बढती पर है
दर्शन कि शिखा मंद हुई जाती है
हवा में बीज बोने वाले हंसी के पत्र हैं
कवी और रहस्यवादी होने कि राह
बंद हुई जाती है

-. रामधारी सिंह दिनकर

उपदेशक

Saturday, July 11th, 2009

मुजरिम हो कर
मुजरिम को सुधारने का काम
यह भी एक स्वांग है
और यह स्वांग हम सभी लोग
भरते हैं
जिन मजों से हम दूसरो को
रोकना चाहते हैं
उन से खुद परहेज़ नहीं करते हैं

वेतरनी के छींटें किस पर नहीं पड़े हैं ?
किस के दामन पर
फूलों के रस का दाग नहीं है ?
सपने की देह को नंगी उंगली से
छूने का लोभ किसमें नहीं जागा है ?
कौन इतना जर्जर है
कि उसमें जवानी की आग नहीं है ?

तो उपदेशकों
आओ , हम ईमानदार बनें
और मानवता को डरायें नहीं
बल्कि यह कहें :

कि जिस सरोवर का जल पीकर
तुम पछताते हो
उस तालाब का पानी
हमने भी पिया है
और जैसे तुम हंस हंस कर रोते
और रो रो कर हंसते हो
इसी तरह हंसी और रुदन से
भरा जीवन हमने भी जीया है

गनीमत है कि हर पापी का भविष्य है
जैसे हर संत का अतीत होता है
आदमी घबरा कर व्यर्थ रोता है

यह बात दूसरी है
कि कोई समृद्धि में है
कोई अभाव में है
मगर जहां तक मन का सवाल है
हम सभी एक ही नाव में है

सदियों से हमने तुम्हें धोखा दिया है
मगर अब हम तुम्हें और नहीं भरमायेगे
जहाँ तक पहुँच कर हम रुक गए हैं
उस से आगे का रास्ता तुम्हे नहीं बतायेंगे

- रामधारी सिंह दिनकर

परम्परा

Friday, July 10th, 2009

परम्परा को अंधी लाठी से मत पीटो
उस में बहुत कुछ
जो जीवित है ,
जीवन दायक है ,
जैसा भी हो
ध्वंस से बचा के रखने लायक है

पानी का छिछला होकर
समतल में दौड़ना
यह क्रांति का नाम है
लेकिन घाट बाँध कर
पानी को गहरा बनाना
यह परम्परा का काम है

परम्परा और क्रान्ति में
संघर्ष चलने दो
आग लगी है तो
सूखी टहनियों को जलने दो
मगर जो टहनियां
आज भी कच्ची और हरी हैं
उन पर तो तरस खाओ
मेरी एक बात तो तुम मान जाओ

परम्परा जब लुप्त होती है
लोगों की आस्था के आधार
टूट जाते हैं
उखाडे हुए पेडों के समान
वे अपनी जड़ों से छूट जाते हैं

परम्परा जब लुप्त होती है
लोगों को नींद नहीं आती
न नशा किये बिना
चैन या कल पड़ती है
परम्परा जब लुप्त होती है
सभ्यता अकेलेपन के
दर्द से मरती है

कलमें लगाना जानते हो
तो जरुर लगाओ
मगर ऐसे कि फलों में
अपनी मिटटी का स्वाद रहे
और यह बात याद रहे
कि परम्परा चीनी नहीं मधु है
वह न तो हिन्दू है , न मुस्लिम है
न द्रविड़ है , न आर्य है
न परम्परा का हर प्रहरी
पूरी का शंकराचार्य है
- रामधारी सिंह दिनकर

देवता और प्रेत

Friday, July 10th, 2009

कवि के मन में देवता और प्रेत
दोनों बसते हैं
प्रेत जब कलम में घुस कर
कविता लिखता है
देवता हंसते हैं

देवता की राह हिंसा नहीं
अहिंसा की राह है
वे इन्द्रियों से लड़ते नहीं
पुचकार कर उन्हें पास बुलाते हैं
देवता के पास
पीपल की छाया होती है
वे छांह में इन्द्रियों को
प्रेम से सुलाते हैं

लेकिन प्रेत कहता है
जीवन से युद्ध करो
मारो, मारो, इन्द्रियों को मारो
और अपने को शुद्ध करो

आँख, कान, नासिका और त्वचा
क्या हम ने इसी लिए पाई थी ?
इन्द्रियां क्या केवल
मार खाने को आई थी?

देवता अच्छे हैं
की कीचड में ईंट नहीं फेंकते हैं
न पंचधुनि जला कर
अपनी इन्द्रियों को सकते हैं

- रामधारी सिंह दिनकर

Hindi Poetry

Wednesday, June 24th, 2009

THIS WEBSITE contains some of the greatest in Hindi Poetry.

And this one from Ramdhari Singh Dinkar is a Killer

रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है
उलझनें अपनी बना कर आप ही फंसता
और फिर बेचैन हो सोता न जगता है

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते मरते
और लाखों बार तुझसे पागलों को भी
चाँदनी मैं बैठ स्वपनों पर सही करते

आदमी का स्वपन है वह बुलबुला जल का
आज उठता है और कल फिर फूट जाता है
किन्तु फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता कविता बनाता है

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली
देख फिर से चाँद मुझको जानता है तू
स्वपन मेरे बुलबुलें हैं, हैं यही पानी
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू

मैं न वह जो स्वपन पर केवल सही करते
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ
और उस पर नींव रखती हूँ नए घर की
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ
मनु नहीं मनु पुत्र है यह सामने जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल
स्वपन के भी हाथ में तलवार होती है

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे
रोकिये जैसे बने इन स्वपन वालों को
स्वर्ग की ही और बढ़ते आ रहे हैं वे