Archive for the ‘Hindi Literature’ Category

इस पार, उस पार

Saturday, June 19th, 2010

Another great one from big B:

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

- Harivansh Rai Bachchan

क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

Saturday, June 19th, 2010

क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

मैं दुखी जब जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं क्र्ताज्न्य हुआ हमेशा,
रीती दोनों ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है भोज भरी;
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

यह भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरों से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का व्यापार जारी?
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

क्यों ना हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुःख नहीं बनते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना है जो दिखाता
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

- Big B (Harivansh Rai Bachchan)

कविता - कुछ टुकडे

Wednesday, February 3rd, 2010

एक सही कविता
पहले
एक सार्थक वक्तव्य होती है।

कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।

कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।

कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

आखिर मैं क्या करूँ
आप ही जवाब दो?
तितली के पंखों में
पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में
कौन सा गुल खिला दूँ
जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा
हाशिये पर चुटकुला बन रहा है
क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर
निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दँ?

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल

कुछ सूचनाएँ

Wednesday, February 3rd, 2010

सबसे अधिक हत्याएँ

समन्वयवादियों ने की।

दार्शनिकों ने

सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।

भीड़ ने कल बहुत पीटा

उस आदमी को

जिस का मुख ईसा से मिलता था।
वह कोई और महीना था।

जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,

किंतु इस बार तो

मौसम बिना बरसे ही चला गया

न कहीं घटा घिरी

न बूँद गिरी

फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु

कई प्रतिशत बढ़ गए
कई बौखलाए हुए मेंढक

कुएँ की काई लगी दीवाल पर

चढ़ गए,

और सूरज को धिक्कारने लगे

–व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है

सूरज कितना मजबूर है

कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।
हवा बुदबुदाती है

बात कई पर्तों से आती है—

एक बहुत बारीक पीला कीड़ा

आकाश छू रहा था,

और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर

शौचालयों के सामने

पँक्तिबद्ध खड़े हैं।
आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं

लोग खोई हुई आवाज़ों में

एक दूसरे की सेहत पूछते हैं

और बेहद डर गए हैं।
सब के सब

रोशनी की आँच से

कुछ ऐसे बचते हैं

कि सूरज को पानी से

रचते हैं।
बुद्ध की आँख से खून चू रहा था

नगर के मुख्य चौरस्ते पर

शोकप्रस्ताव पारित हुए,

हिजड़ो ने भाषण दिए

लिंग-बोध पर,

वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं

आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ

अध्यापिकाएँ बन गई हैं

और रिटायर्ड बूढ़े

सर्वोदयी-

आदमी की सबसे अच्छी नस्ल

युद्धों में नष्ट हो गई,

देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य

विद्यालयों में

संक्रामक रोगों से ग्रस्त है
(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को

सड़को पर

किश्तियों की खोज में

भटकते हुए देखा है)
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ

भीतर ही भीतर

एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है
पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ

प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं

सबसे अच्छे मस्तिष्क,

आरामकुर्सी पर

चित्त पड़े हैं।

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल

कविता

Wednesday, February 3rd, 2010

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे
कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं –
आदत बन चुकी है
वह किसी गँवार आदमी की ऊब से
पैदा हुई थी और
एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ
शहर में चली गयी

एक सम्पूर्ण स्त्री होने के पहले ही
गर्भाधान कि क्रिया से गुज़रते हुए
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादी वाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिश में भीगते हुए
उसने जाना कि हर लड़की
तीसरे गर्भपात के बाद
धर्मशाला हो जाती है और कविता
हर तीसरे पाठ के बाद

नहीं – अब वहाँ अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, अगर हो सके तो बगल के गुज़रते हुए आदमी से कहो –
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

इस वक़्त इतना ही काफ़ी है

वह बहुत पहले की बात है
जब कहीं किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीख़ती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब –
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल

धूमिल की अंतिम कविता

Thursday, January 14th, 2010

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोडे से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

जीवन की ढलने लगी सांझ

Thursday, January 14th, 2010

जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।

बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

- अटल बिहारी वाजपेयी

पुरुरवा कि उक्ति

Saturday, July 11th, 2009

Some pieces from this poem
(1)

मृत्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ

पर , न जाने बात क्या है !
इन्द्र का आयुध , पुरुष जो झेल सकता है
सिहं से बांहे मिला कर खेल सकता है
फूल के आगे वाही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता

विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से

मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर सीस मरना चाहता हूँ
मैं तुम्हारे हाथ का लीला-कमल हूँ
प्रण के सर में उतरना चाहता हूँ

…………
(2)

मृत्य नर को देवता कहना मृषा है
देवता शीतल , मनुज अंगार है

देवताओं की नदी में ताप की लहरें न उठती
किन्तु नर के रक्त में ज्वालामुखी हुंकारता है
घुर्नियाँ चिंगारियों की नाचती हैं
नाचते उड़ कर दहन के खंड पत्तों-से हवा में
मानवों का मन गले-पिघले अनल की धार है

चाहिए देवत्व
पर , इस आग को धर दूं कहाँ पर ?
कामनाओं को विसर्जित व्योम में कर दूं कहाँ पर ?
वह्नी का बेचैन यह रस्कोश , बोलो , कौन लेगा ?
आग के बदले मुझे संतोष , बोलो , कौन देगा ?

-. रामधारी सिंह दिनकर

कविता और विज्ञान

Saturday, July 11th, 2009

हम रोमांटिक थे
हवा में महल बनाया करते थे
चाँद के पास हम ने एक नीड बसाया था
मन बहलाने को हम उस में आया जाया करते थे

लेकिन तुम हम से ज्यादा होशियार होना
कविता पढने में समय मत खोना
पढना ही हो , तो बजट के आंकड़े पढो
वे ज्यादा सच्चे और ठोस होते हैं

अगर तुम यह समझते हो
कि तुम केवल शरीर नहीं
आत्मा भी हो
तो यह अनुभूति तुम्हें
तकलीफ में डालेगी
जो सभ्यता अदृश्य को नहीं मानती
वह आत्मा को कैसे पालेगी ?

विज्ञान कि छड़ी जहां तक पहुंची है
बुद्धि सत्य को वहीँ तक मानती है
मशीन को लाख समझाओ
वे आत्मा को नहीं पहचानती हैं

सांख्यिकी बढती पर है
दर्शन कि शिखा मंद हुई जाती है
हवा में बीज बोने वाले हंसी के पत्र हैं
कवी और रहस्यवादी होने कि राह
बंद हुई जाती है

-. रामधारी सिंह दिनकर

उपदेशक

Saturday, July 11th, 2009

मुजरिम हो कर
मुजरिम को सुधारने का काम
यह भी एक स्वांग है
और यह स्वांग हम सभी लोग
भरते हैं
जिन मजों से हम दूसरो को
रोकना चाहते हैं
उन से खुद परहेज़ नहीं करते हैं

वेतरनी के छींटें किस पर नहीं पड़े हैं ?
किस के दामन पर
फूलों के रस का दाग नहीं है ?
सपने की देह को नंगी उंगली से
छूने का लोभ किसमें नहीं जागा है ?
कौन इतना जर्जर है
कि उसमें जवानी की आग नहीं है ?

तो उपदेशकों
आओ , हम ईमानदार बनें
और मानवता को डरायें नहीं
बल्कि यह कहें :

कि जिस सरोवर का जल पीकर
तुम पछताते हो
उस तालाब का पानी
हमने भी पिया है
और जैसे तुम हंस हंस कर रोते
और रो रो कर हंसते हो
इसी तरह हंसी और रुदन से
भरा जीवन हमने भी जीया है

गनीमत है कि हर पापी का भविष्य है
जैसे हर संत का अतीत होता है
आदमी घबरा कर व्यर्थ रोता है

यह बात दूसरी है
कि कोई समृद्धि में है
कोई अभाव में है
मगर जहां तक मन का सवाल है
हम सभी एक ही नाव में है

सदियों से हमने तुम्हें धोखा दिया है
मगर अब हम तुम्हें और नहीं भरमायेगे
जहाँ तक पहुँच कर हम रुक गए हैं
उस से आगे का रास्ता तुम्हे नहीं बतायेंगे

- रामधारी सिंह दिनकर